टिहरी की प्राकृतिक विशेषता

                                पहाड़ और घाटी

टिहरी चारों तरफ सि ऊँचा-नीचा हिमालयी पहाड़ों सि घिर्युं छ।
यख की पहाड़ी सीधी, गहरी अर हरियाली सि ढकी होन्दी, जैका बिच-बिच मा छोटी घाटियाँ अर खेत (सीढ़ीनुमा) दिखै देन्दा।


                                          नदियाँ और जलस्रोत

  • भागीरथी नदी टिहरी की जीवनरेखा छ।
  • भिलंगना अर अलकनंदा की सहायक धाराँ इलाका सणि सिंचित करदी।
  • टिहरी झील (बाँध बण्ना का बाद) एशिया की बड़ी मानव-निर्मित झीलों मजिन एक छ।
    नदी यख सिर्फ पाणि नी, आस्था अर जीवन कु आधार छ।

                                           जंगल अर जैव विविधता

टिहरी मा घना जंगल पाया जान्दा:

  • बाँज, बुरांश, देवदार, चीड़, रिंगाल
  • वसंत में बुरांश के लाल फूल पूरे पहाड़ को रंग देते हैं 
    यख कस्तूरी मृग, घुरल, तेंदुआ, रीख अर अनेक पक्षी प्रजातियाँ मिल्दी।

                                              मौसम अर ऋतु

  • गर्मी: सुहावनी अर ठंडी
  • बरसात: हरियाली सि भरी, पर भूस्खलन कु खतरा
  • सर्दी: ऊँचाई वाळा इलाकु मा बर्फबारी
    मौसम प्रकृति सणि सुंदर भी बणौन्दी अर चुनौतीपूर्ण भी।

                                      खेत-खल्याण अर गौं का दृश्य

सीढ़ीनुमा डोखरों मा

  • मडुवा, झंगोरा, गेहूँ, दालें उगै जान्दी।
    गौं मा सुबे ध्वाँला की हल्की लकीर, गौड़ों की घंटी अर पुथलों की अवाज़— यी टिहरी की असली तस्वीर छ।

                                     प्रकृति और जीवन का रिश्ता

टिहरी की प्रकृति सिर्फ देखणा की चीज़ नी—
स्यु लोगुं का गीत, कहानी अर जीवन संघर्ष मा बसती ।
यख प्रकृति से लड़िक नी, तैका दगड़ी रैक जीणु सीखै जान्दी।


 

 

 

टिहरियाली जगा
टिहरियाली जगा
संस्कृति अर सांस्कृतिक वाद्य यंत्र

टिहरी का प्रमुख सांस्कृतिक वाद्य यंत्र अर तौकु इतिहास

🔹 ढोल–दमाऊ

ढोल–दमाऊ टिहरी अर पूरा गढ़वाल इलाका का सबसी प्राचीन और प्रतिष्ठित वाद्य यंत्र छ।

इतिहास अर महत्व

  • योंकीं परंपरा कत्यूरी काल (7वीं–11वीं शताब्दी) से जुड़ी माणे जान्दी।
  • राजदरबार, युद्ध घोष, मंदिर अनुष्ठान अर लोकनृत्यों में योंकु उपयोग होन्दु थै।
  • ढोल अर दमाऊ हमेशा जोड़ी मा बजदा—यु संतुलन अर सामूहिकता कु चिन्ह छ।
  • ढोल की बोलियाँ अलग-अलग अवसरों (जन्म, विवाह, युद्ध, मृत्यु) का खातिर अलग होन्दी।

सांस्कृतिक भूमिका

  • पांडव लीला, जागर, झुमैलो, चौफुला जैसे नृत्य ढोल–दमाऊ का बिना अधूरा माणे जान्दा।

🔹 रणसिंघा

रणसिंघा एक धातु सि बण्युं घुमावदार वाद्य छ।

इतिहास

  • येकु उपयोग प्राचीन समै मा राजाओं अर सेना द्वारा युद्ध या महत्वपूर्ण घोषणाओं का खातिर होन्दु थै।
  • टिहरी रियासत मा ये राजकीय वाद्य कु दर्जा प्राप्त थै।

धार्मिक उपयोग

  • देवी-देवतौं की पूजा, मेलों और विशेष अनुष्ठानों मा आज भी बजै जान्दु।

 तुरही

तुरही लंबी, सीधी धातु की फूँक-वाद्य यंत्र छ।

ऐतिहासिक भूमिका

  • राजमहलों, मंदिरों अर नगर-प्रवेश का समै संकेत देण का खातिर परयोग।
  • विशेष रूप सि देव-आह्वान अर शुभ अवसरों से जुड़ीं।

हुड़का

हुड़का छोटु, हाथ मा पकड़ै जाण वाळु ढोल छ।

इतिहास अर परंपरा

  • लोकगायकों द्वारा जागर अर कथात्मक गायन मा उपयोग
  • यु वाद्य एकल कलाकार अर कथा-परंपरा सि जुड़युं छ।
  • हुड़का का दगड़ी गायुं गै गीत इतिहास अर लोककथा सणि जीवित रखदु।

 मंजीरा / थाली

  • धार्मिक अनुष्ठानों, भजन और कीर्तन मा उपयोग
  • साधारण होते हुए भी सामूहिक गायन कु आधार

 सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व

  • यी वाद्य यंत्र लिखित इतिहास सि पैली का मौखिक इतिहास सणि सँजोया छ।
  • समाज मा यी सूचना, उत्सव अर शोक—तीन्यों का जरिया रै।
  • ढोल की बोली सणि आज भी “देववाणी” माणे जान्दु
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